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हो रहा मेरे देश का ये कैसा विकास है ?

हो रहा मेरे देश का- ये कैसा विकास है ? चढ़ रही बलि हर रोज़ अपने ही नैतिक मूल्यों की  छिन गया सुख चैन मेरा  आज मन बहुत उदास है  हो रहा मेरे देश का  ये कैसा विकास है ? मेट्रो आ गयी  स्मार्ट फ़ोन आ गए  सूचना तकनीकी के क्षेत्र मैं  नए-नए मुकाम हासिल हो गए  विकास के नए आयाम गढ़ कर  हम दुनिया मैं छा गए  ठीक से लिखना पढ़ना भी नहीं आता जिसको  पैसे वालों का वो गधा भी पास है  हो रहा मेरे देश का  ये कैसा विकास है ? गुंडे और बदमाशों के तो  ठाठ और बाट हैं  गरीब और लाचारों के लिए  घूंसे और लात हैं  शरीफों की दुनिया  अब रही कहाँ  चारों तरफ छा रहे  गुंडे और बदमाश हैं  हो रहा मेरे देश का ये कैसा विकास है ?  इज्ज़तदारों और शरीफों के  नकाब ओढ़ कर आ जाते हैं  बेबसों और लाचारों का  काम तमाम कर जाते हैं  इनका कुछ नहीं बिगड़ता  बेकसूर मारे जाते हैं  बेकसूरों के बदले  कसूरवार छोड़े जाते हैं  मक्कारी की ये दुनियां  मुझे आती नहीं अब रास है  हो रहा मेरे देश का  ये कैसा विकास है ?   लेखक