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लघु काव्यांश-2








लघु काव्यांश-2

प्रैक्टिकल हुआ समाज बड़ा 
इक पल मैं ही जी लूँ जरा
 बीवी तो बाद मिल ही जाएगी शादी के बाद 
जब तक के लिए ढूंढ लूँ कोई अप्सरा


 जोगी बिन पति न सुहाए 
पति सुहाए न जोगी 
बीच भंवर मैं फंसी ये नारी
 जाने किसकी होगी


 न तेरी है न मेरी है
 फिर क्यों आँख तरेरी है
 एक लड़की के वास्ते 
क्यों तूने रण छेड़ी है


 मन मैं है क्या तेरे
 कह दे आज जरा
 नापाक इरादे खोल दे 
मैं भी तो कहने को खड़ा 

लेखक
                                                                                 
                                                                                                                                                                                                       
राज गोपाल

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